Saturday, June 14, 2014

मेरे पापा

दूसरी बेटी होने पर जब सब ने मां को कोसा।
पापा ने आगे बढ़कर उस दिन सबको रोका।।

पहली बार उन्होंने जब मुझे गोद में उठाया।
कहते हैं वो उस दिन को, मैं कभी भुला न पाया।।

लड़ती थी मैं उनसे, झगड़ती थी मैं उनसे।
बरगद से लता की तरह, लिपटती थी मैं उनसे।।

घुटनों के बल चलकर, गोद में मैं चढ़ जाती थी।
फलों की आढ़त वाला दूल्हा लाना, कहकर मैं इतराती थी।।

मेरे पीछे-पीछे दौड़कर मुझे साइकिल चलाना सिखाया।
अपने हर फर्ज को उन्होंने बखूबी निभाया।।

मेरे गिरने से पहले ही उन्होंने मुझे संभाला।
मेरी हर ख्वाहिश को अपने सपनों सा पाला।।

जो कुछ भी मैंने पाया, उनसे ही है पाया।
सिर पर पापा का हाथ जैसे तरुवर की है छाया।।

दूर रहकर भी मुझसे, दिल से हैं वो मेरे पास।
पापा की प्यारी बेटी होने सा नहीं है कोई एहसास।।

21 comments:

  1. बचपन की याद ताज़ा कराते खूबसूरत एहसास !

    सादर

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    1. शुक्रिया यशवंत जी
      सादर

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  2. बहुत भावपूर्ण रचना...शुभकामनायें!

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  4. बेहतरीन भाव पापा के लिए। पापा तो बस पापा ही होते हैं यार।

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    1. हाँ स्मिता सही कहा
      शुक्रिया

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  5. मन को छूने वाले भाव ....

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    1. धन्यवाद मोनिका जी...

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (16-06-2014) को "जिसके बाबूजी वृद्धाश्रम में.. है सबसे बेईमान वही." (चर्चा मंच-1645) पर भी है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  7. सुन्दर सन्देश पितृ दिवस पर...

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  8. पितृ दिवस पर बेहद भावुक व मर्मस्पर्शी रचना।

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    1. आपका शुक्रिया

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  9. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  10. बहुत खूब...... बहुत अच्छा लगा पढ़कर!

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  11. सभी रचनाएँ भाव प्रधान हैं !

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    1. सादर धन्यवाद देवदत्त जी

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