Saturday, September 29, 2012

इबादत

खुशियों की तलाश में निकले थे हम
लेकिन नसीब में लिखे थे सिर्फ  गम
सोचा न था कि वक्त हमें ये दिन दिखाएगा
जिसकी हंसी के लिए मांगते हैं हम दुआएं,वही हमें रुलाएगा
हमने तो खुद से बढ़कर के उसे चाहा हमेशा
नहीं पता था कि वो मेरा  साथ यूं निभाएगा
जिस पल में होगी मुझे उसकी सबसे ज्यादा जरूरत
उस पल वो मुझे छोड़कर चला जाएगा
पर क्या करें हम हैं बहुत मजबूर, लाख रोके इस दिल को
लेकिन फिर भी सिर उनके लिए इबादत करने में झुक जाएगा

Tuesday, July 24, 2012

संस्कारों को पहनावे से न तोलें


खाप पंचायतें तो हमेशा से ही अपने बेबुनियादी फतवों के लिए जानी जाती रही हैं। खाप के सारे सदस्य महिलाओं को एक तुच्छ वस्तु समझते रहे हैं और उन पर हमेशा अपना अधिकार और आदेश थोपने की कोशिश करते रहे हैं। इस सब के बावजूद अगर हरियाणा के जींद जिले के बीबीपुर गांव में खाप में महिलाओं को बराबर का हक और सम्मान दिया जा रहा है तो ये बड़ी बात है और दूसरी ओर मुजफ्फरनगर के मंसूरपुर के गांव दूधाहेड़ी में लड़कियां एक अलग पंचायत बनाकर खाप के फैसलों का समर्थन कर रही हैं और खुद खाप के बताए रास्ते पर चलने के लिए आतुर हो रही हैं। उन्हें खाप का 40 साल से कम उम्र की महिलाओं को घर से बाहर अकेले न निकलने और मोबाइल न रखने का फैसला गलत नहीं सही लग रहा है और वो इसके समर्थन में भी उतर आर्इं। एक ओर तो महिलाएं अपना बर्चस्व बचाने के लिए लड़ाई लड़ रही हैं और दूसरी ओर खाप के ऐसे फैसलों के समर्थन में आगे भी आ रही हैं। वो ये मानने के लिए तैयार हैं कि जींस पहनना, लम्बे नाखून रखना, बाल कटवाना और मोबाइल फोन का इस्तेमाल करना उनके लिए सही नहीं है। क्या ये सही है? जैसे सूट एक पहनावा है वैसे ही जींस भी एक पहनावा है। सूट से भी पूरा बदन ढकता है और जींस से भी तो फिर सूट सही और जींस गलत क्यों है। खाप के समर्थन में आई कुछ लड़कियों का कहना है कि जींस पर वो दुपट्टा नहीं डाल सकतीं, तो क्या दुपट्टा डालना ही लड़कियों के लिए सेफ्टी है। जब लोग सलवार-सूट और दुपट्टे की बात करते हैं तो ये क्यों भूल जाते हैं कि रेप करने के बाद गरदन दबाकर मारने के लिए दुपट्टा एक बहुत ही उपयुक्त अस्त्र है। हो सकता है ऐसे में लड़की अगर जींस पहने हो तो उसका गला घोटने में दिक्कत हो लेकिन दुपट्टे से तो ये काम बहुत आसानी से हो सकता है। बलात्कार के बाद हत्या के कई मामलों में ऐसा हुआ भी है कि पीड़िता के दुपट्टे से ही उसका गला घोटा गया हो। 7 नवबंर 2011 को मेरठ के लाला लाजपत राय मेडिकल कॉलेज के कैंपस में पूनम नाम की एक लड़की का गैंगरेप हुआ और उसके बाद उसकी हत्या कर दी गई। हत्या के लिए  पूनम के दुपट्टे का ही इस्तेमाल किया गया। पूनम ने उस समय सलवार-सूट और जैकेट पहना था, साथ ही उसके दुपट्टा भी डाला था। खाप के अनुसार अगर जींस पहनना गलत है और सलवार-सूट पहनना सही तो फिर पूनम के साथ ऐसा क्यों हुआ? उसने तो जींस नहीं पहनी थी। ये तो इस तरह की घटना का सिर्फ एक उदाहरण है, इसके अलावा न जाने कितने और ऐसे मामले हुए होंगे जिसमें सूट पहनने वाली लड़कियों का रेप हुआ हो। यही नहीं सूट पहन कर पैदल चल रही लड़कियों का तो लड़के दुपट्टा खींचने से भी गुरेज नहीं करते। एक ओर तो देश की लड़कियां अपनी पसंद के कपड़े पहनने के लिए स्लट वॉक कर रही हैं और दूसरी ओर खाप के ऐसे फैसलों का समर्थन कर रही हैं। अब तो महिला आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा ने भी लड़कियों के पहनावे के खिलाफ बयान देकर ये साबित कर दिया कि महिलाओं के हित के लिए बनाई गई ये संस्था क्या सच में उनके हित के बारे में सोच रही है? महिलाएं ऐसा करके पुरुषों की संकीर्ण मानसिकता को बढ़ावा दे रही हैं और सरे-राह उन्हें छेड़ने वाले लड़कों को सही साबित कर रही हैं। उनके इस तरह के बयानों से साफ तौर पर यही साबित होता है कि लड़कियों के साथ होने वाली घटनाओं के लिए लड़कों को नहीं बल्कि लड़कियों को ही जिम्मेदार मानती हैं, जो बिल्कुल गलत है। इसके अलावा मैंने कई लोगों को कहते सुना और कई अखबारों में भी पढ़ा है कि लम्बे नाखून लड़कियों के लिए अस्त्र का काम करते हैं। लम्बे नाखूनों से वो किसी का भी मुंह नोच सकती हैं। तो फिर नाखूनों को लम्बा रखना बुरा क्यों है? इतना ही नहीं उनके तो मोबाइल के इस्तेमाल पर भी प्रतिबंध लगाने की कोशिश की जा रही है और लड़कियां इससे सहमत भी हैं। हमेशा से लड़कियों के पहनावे, उनके शौक, रहन-सहन के तरीके को लेकर लोग सवाल उठाते रहे हैं और लड़कियां उसे मानती रही हैं लेकिन क्या ये सही है? हर किसी को अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीने का अधिकार है। हर कोई ये निर्णय ले सकता है कि वो क्या पहनेगा, क्या खाएगा। किसी के ऊपर अपने फैसले लादना ना तो सामाजिक दृष्टि से सही और ना ही संवैधानिक। तो फिर संविधान के खिलाफ जाकर किसी को अपने फैसले मानने के लिए बाधित करना कहां तक सही है...और फिर खुद को समाज का रखवाला बताने वाले ये खाप पंचायत के ये सदस्य ये क्यों नहीं समझते कि उनके मना करने से ना तो जींस की बिक्री में कोई परिवर्तन आएगा और न ही हिंदुस्तान के लोगों के जीन्स में कोई परिवर्तन आएगा। अगर पहनावे के आधार पर लड़कियों के संस्कार और इज्जत का फैसला किया जाता है, तो ऐसी लड़कियों का क्या जो झोपड़-पट्टी में रहती हैं और जींस पहनना तो दूर उसके बारे में सोचती भी नहीं है फिर भी समाज के शरीफ और इज्जतदार नुमाइंदे उनकी इज्जत तार-तार कर देते हैं।
मुजफ्फरनगर में 50 लड़कियों ने जो फैसला लिया है, वैसे तो वो उनका निजी फैसला है और उनको पूरा अधिकार है कि वो अपनी मर्जी से कपड़े पहन सकें लेकिन अगर वो खाप के समर्थन में आकर खड़ी हो रही हैं तो उन्हें ये भूलना नहीं चाहिए कि भारत का पुरुष प्रधान रुढ़िवादी समाज उन्हें कभी आगे नहीं आने देगा। सालों पहले ऐसे ही पुरुषों ने महिलाओं को पर्दा प्रथा की बेड़ियों में जकड़ा था और आज जब महिलाएं पुरुषों से आगे निकल रही हैं तो उनका अहंकार और डर फिर से महिलाओं को दबाने के लिए उन पर तरह-तरह से शिकंजे कसने की कोशिश कर रहा है। आज तो बात सिर्फ पहनावे की है, कहीं ऐसा न हो कि इस फैसले का समर्थन फिर से लड़कियों की वही दुर्दशा कर दे जो सालों पहले हुआ करती थी। अगर ऐसा हुआ तो पर्दा प्रथा, बाल विवाह, सती प्रथा जैसी कुप्रथाएं मुंह फैलाकर लड़कियों को अपना ग्रास बनाने के लिए तैयार हो जाएंगी।  इज्जत और सम्मान तो दिल से किया जाता है, कपड़ों से नहीं। सही मायनों में किसी का पहनावा इसमें कोई भूमिका नहीं निभाता। जरूरत है तो बस इसको समझने की और किसी के फैसलों को अपने ऊपर हावी न होने देने की, ऐसा करने पर ही महिलाएं इस समाज में रहने वाले खुदगर्ज लोगों के बीच में अपना वर्चस्व कायम रखने में सफल हो पाएंगी।


अनुषा मिश्रा


Wednesday, July 18, 2012

मौत आनी है आएगी एक दिन


फिल्मी जगत के सुपर स्टार राजेशखन्ना का बुधवार दोपहर मुंबई स्थित उनके आवास पर निधन हो गया। 'पुष्पा मुझसे ये आंसू देखे नहीं जाते...आई हेट टियर्स' जैसा यादगार डायलॉग देने वाला ये सुपरस्टार लोगों की आंखों में आंसू देकर इस जहां से चला गया। आज शायद ही किसी को याद हो 1969 का वो दौर जब राजेश खन्ना एक हवा के हल्के झोंके की तरह आकर अपने जादुई मुस्कान से देश की हर युवा लड़की के दिलो-दिमाग पर छा गए। कई बार सुना है कि ये वो दौर था कि लड़कियों में राजेश खन्ना को लेकर ऐसी दीवानगी थी कि हर लड़की के तकिए के नीचे उनकी एक तस्वीर हुआ करती थी। 60-70 के दशक में जब लड़कियां घर के बाहर बिना पापा या भाई के साथ के कदम भी नहीं रखती थीं। तब ना तो हर घर में टीवी हुआ करते थे और ना ही फेसबुक, आरकुट जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जरिए फिल्मों और अभिनेताओं का प्रचार-प्रसार, उस दौर में जब सिर्फ अखबार के जरिए लोगों को फिल्मों के बारे में पता चलता था और सिनेमा हॉल में ही फिल्में देखी जाती थीं, लड़कियों का राजेश खन्ना के लिए दीवाना होना उनकी उस शख्सियत को बयां करता है जिसकी बस एक झलक पाने के  लिए घंटों तक स्टूडियो के बाहर लड़कियां कतार लगाकर खड़ी रहती थीं।
29 दिसंबर 1942 को अमृतसर में जन्मे राजेश खन्ना का असली नाम जतिन खन्ना था। अपने फिल्मी करियर की शुरूआत राजेश खन्ना ने 1966 में आई फिल्म 'आखिरी ख़त' से की थी। उस समय राजेश खन्ना की उम्र 24 बर्ष थी। खत के बाद उन्होंने राज, बहारों के सपने और औरत के रूप जैसी कई फिल्में की लेकिन 1969 में आई फिल्म 'आराधना' ने उन्हें रातों रात एक स्ट्रगलिंग स्टार से सुपर स्टार बना दिया। राजेश खन्ना ने अभिनय को अपना करियर परिवार वालों की मर्जी के खिलाफ चुना था लेकिन उनकी इस सफलता से उनके परिवार वालों का सिर भी फख्र से ऊंचा हो गया। आराधना में शर्मिला टैगोर के साथ उनकी जोड़ी को बहुत पसंद किया गया और वो सिर्फ लड़कियों ही नहीं बल्कि हर किसी के दिलो-दिमाग पर छा गए। आराधना के सुपरहिट होने के बाद राजेश खन्ना ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और एक के बाद एक लगातार 15 हिट फिल्में देकर दूसरे अभिनेताओं के लिए एक मिसाल कायम कर दी। इसके बाद मुमताज के साथ भी उन्होंने कई हिट फिल्में दीं और राजेश-मुमताज की जोड़ी के लोग दीवाने हो गए।
अपने रोमांटिक अंदाज, मासूम मुस्कान, स्वाभाविक अभिनय के साथ कई हिट फिल्मों की बदौलत करीब डेढ़ दशक तक उन्होंने सिने प्रेमियों के दिल पर राज किया। उनके रूप में सिनेमा जगत को एक ऐसा सुपरस्टार मिला जिसकी स्टाइल के आज 4 दशक बाद भी लोग दीवाने हैं।
राजेश खन्ना ने अपनी जिंदगी में अपने बेहतरीन अभिनय के लिए कई पुरस्कार जीते। वर्ष 1970 में फिल्म सच्चा-झूठा के लिए पहली बार उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला। इसके बाद आने वाला साल यानी कि 1971 उनके करियर का सबसे अच्छा साल माना जाता है। इस साल में उन्होंने आनंद, आन मिलो सजना, कटी पतंग, हाथी मेरे साथी, अंदाज और महबूब की मेहंदी जैसी सुपरहिट फिल्में दी।
दो रास्ते, दुश्मन, बावर्ची, मेरे जीवन साथी, जोरू का गुलाम, अनुराग, दाग, नमक हराम और हमशक्ल के रूप में हिट फिल्मों के जरिए उन्होंने बॉक्स आफिस को कई वर्षों तक गुलजार रखा।
आनंद फिल्म में उनके द्वारा किए गए भावपूर्ण अभिनय को एक उदाहरण के तौर पर लिया जाता है। लोगों के अंदर जिंदगी के सबसे कठिन दौर में भी अपनी मुस्कुराहट को बरकरार रखने का जज्बा इस फिल्म के जरिए राजेश खन्ना ने पैदा किया। इस फिल्म में उनके सशक्त अभिनय के लिए वर्ष 1971 में उन्हें लगातार दूसरी बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फिल्मफेयर पुरस्कार से नवाजा गया। तीन साल बाद उन्हें आविष्कार फिल्म के लिए भी यह पुरस्कार प्रदान किया गया। साल 2005 में उन्हें फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड दिया गया था।
गायक किशोर कुमार और संगीतकार आरडी बर्मन के साथ राजेश खन्ना की जोड़ी ने कई फिल्मों में यादगार संगीत दिया। फिल्म आराधना के गीत 'रूप तेरा मस्ताना' और 'मेरे सपनों की रानी' में तीनों ने पहली बार एक साथ काम किया और इसके बाद लगभग 30 फिल्मों ने इन्होंने एक साथ काम किया। किशोर कुमार के अनेक गाने राजेश खन्ना पर ही फिल्माए गए और किशोर के स्वर राजेश खन्ना से पहचाने जाने लगे।

1973 में अपने से कई साल छोटी नई अभिनेत्री डिम्पल कपाड़िया से राजेश खन्ना ने शादी की और वे दो बेटियों ट्विंकल और रिंकी के पिता बन गए, लेकिन राजेश खन्ना का वैवाहिक जीवन ज्यादा दिनों तक नहीं चल सका और कुछ समय बाद ही वो अलग गए। इसके बाद राजेश खन्ना फिल्मों में व्यस्त हो गए और डिंपल ने भी अपने करियर पर ध्यान देना जरूरी समझा। राजेश खन्ना ने करीब डेढ़ दशक तक लोगों के दिलों पर राज किया लेकिन 1980 के बाद उनका करियर डगमगाने लगा। इसके बाद उन्होंने राजनीति में कदम रखा और 1991 से 1996 तक नई दिल्ली से कांग्रेस के लोकसभा सांसद भी रहे।
इस बीच उन्होंने अभिनय की भी एक नई पारी शुरू की और वर्ष 1994 में फिल्म खुदाई में काम किया। उसके बाद 1999 में आ अब लौट चलें, 2002 में क्या दिल ने कहा, 2006 में जाना और उसके बाद वफा फिल्में कीं लेकिन इस दौर में ना तो राजेश खन्ना के पहले जैसे प्रशंसक रह गए थे, ना ही भीड़ में राजेश-राजेश चीखती हजारों लड़कियों की आवाज और ना ही बस एक बार राजेश खन्ना को छू लेने भर की दीवानगी।
- अनुषा मिश्रा

Thursday, June 21, 2012

एक हंसी ख्वाब


कभी खुली तो कभी बंद आंखों से देखा था एक ख्वाब
कभी सोते तो कभी जागते हुए देखा था एक ख्वाब
एक हंसी हमसफर का हाथ थामे समंदर के किनारे टहलने का ख्वाब
उसकी बाहों में बाहें डाले अम्बर की ऊंचाइयां छूने का ख्वाब
उसकी एक प्यारी सी मुस्कुराहट के लिए कुछ भी कर गुजरने का ख्वाब
उसके चेहरे को देखकर सूरज के उगने और शाम के ढलने का ख्वाब
खुद को उसकी पलकों में छुपाकर जिंदगी गुजारने का ख्वाब
मुझे है यकीं एक दिन खयालों से निकलकर हकीकत से रूबरू होगा मेरा ख्वाब


Tuesday, May 15, 2012

क्षण भर को क्यों प्यार किया था ?


अर्द्ध रात्रि में सहसा उठकर,
पलक संपुटों में मदिरा भर,
तुमने क्यों मेरे चरणों में अपना तन-मन वार दिया था?
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

यह अधिकार कहाँ से लाया!
और न कुछ मैं कहने पाया -
मेरे अधरों पर निज अधरों का तुमने रख भार दिया था!
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

वह क्षण अमर हुआ जीवन में,
आज राग जो उठता मन में -
यह प्रतिध्वनि उसकी जो उर में तुमने भर उद्गार दिया था!
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?
- हरिवंश राय बच्चन


चाँद और कवि


रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।
जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?
मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी
चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।
आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का
आज बनता और कल फिर फूट जाता है
किन्तु, फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो?
बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है।
मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली,
देख फिर से चाँद! मुझको जानता है तू?
स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी?
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?
मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,
आग में उसको गला लोहा बनाता हूँ,
और उस पर नींव रखता हूँ नये घर की,
इस तरह दीवार फौलादी उठाता हूँ।
मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी
कल्पना की जीभ में भी धार होती है,
बाण ही होते विचारों के नहीं केवल,
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।
स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे-
रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे,
रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।
– रामधारी सिंह दिनकर 

Sunday, May 13, 2012

छोटी बेटी

मां, मुझे जन्म दो,
मैं जानती हूं तुम्हारी पलकें गीली हैं गर्भ को पहचान कर
दीदी को गोद में बिठाकर तुम रोज एक सपना देखतीं थीं
रक्षा बंधन के त्यौहार का और दूज के टीके का
जो मेरी पहचान के साथ गया
दादी उदास हैं और पापा कुछ परेशान
एक और बेटी का दहेज अभी से जुटाने की चिंता 
खींच देंगी उनके माथे पर कुछ और लकीरें 
कितना क्रूर होता है छोटी बेटी का नसीब
उसके आने से पहले न जाने कितने उपाय किए जाते हैं
कि वो न आए,
लेकिन फिर भी वो आ ही जाती है
छोटी-छोटी बाहें फैलाए, अपनी नन्ही चमकती आंखों के साथ
वो प्यार भी चाहेगी और दुलार भी
छोटी बेटी है वो इसलिए उसके जन्म पर आंसू मत बहाना