Sunday, June 15, 2014

दाह-संस्कार


उम्र में तरुणाई सी छाने लगी थी
बचपन से निकल कर मन यौवन की कुलाचें भरने लगा था
कई रंगीन सपने उसकी आंखों में पलने लगे थे
प्रेम के मोती हृदय की सीपी से बाहर निकलने लगे थे
सफेद घोड़े पर बैठा राजकुमार उसे हर पल नजर आता था
और आज तो वो राजकुमार उसके सामने था
उसे लगा कि उसकी उम्मीदों को आज परवाज मिल गई
खो जाना चाहती थी वो उसकी बाहों में
पंख लगाकर उड़ जाना चाहती दूर आसमान में
फिर एक दिन ले गया वो उसको अपने साथ
ये कहकर, कि दूर कहीं हम अपने प्यार का एक जहां बसाएंगे
एक-दूसरे से किए हर वादे को ता-उम्र निभाएंगे
लेकिन ये क्या, वो तो छोड़ आया उस मासूम लड़की को
वहां जहां हर दिन न जाने कितनी लड़कियां बेमौत मरती थीं
अभी-अभी तो लड़की के परों में जान आई थी
और अभी उसको पिंजड़े में कैद कर दिया
सहमी हुई सी लड़की बेचैन निगाहों से 
ताक रही थी चिर शून्य आसमान
जहां उसे अपना भविष्य काले बादलों में 
खोता हुआ नजर आ रहा था
हर दिन उसे परोस दिया जाता था 
कई अनचाहे मेहमानों के सामने जो
पल-पल उसके जिस्म से उसकी सांसे खींच रहे थे
नन्ही सी वो कली अब एक जिंदा लाश में तब्दील हो गई थी
जिसका बस दाह-संस्कार होना बाकी था।