Sunday, June 15, 2014

दाह-संस्कार


उम्र में तरुणाई सी छाने लगी थी
बचपन से निकल कर मन यौवन की कुलाचें भरने लगा था
कई रंगीन सपने उसकी आंखों में पलने लगे थे
प्रेम के मोती हृदय की सीपी से बाहर निकलने लगे थे
सफेद घोड़े पर बैठा राजकुमार उसे हर पल नजर आता था
और आज तो वो राजकुमार उसके सामने था
उसे लगा कि उसकी उम्मीदों को आज परवाज मिल गई
खो जाना चाहती थी वो उसकी बाहों में
पंख लगाकर उड़ जाना चाहती दूर आसमान में
फिर एक दिन ले गया वो उसको अपने साथ
ये कहकर, कि दूर कहीं हम अपने प्यार का एक जहां बसाएंगे
एक-दूसरे से किए हर वादे को ता-उम्र निभाएंगे
लेकिन ये क्या, वो तो छोड़ आया उस मासूम लड़की को
वहां जहां हर दिन न जाने कितनी लड़कियां बेमौत मरती थीं
अभी-अभी तो लड़की के परों में जान आई थी
और अभी उसको पिंजड़े में कैद कर दिया
सहमी हुई सी लड़की बेचैन निगाहों से 
ताक रही थी चिर शून्य आसमान
जहां उसे अपना भविष्य काले बादलों में 
खोता हुआ नजर आ रहा था
हर दिन उसे परोस दिया जाता था 
कई अनचाहे मेहमानों के सामने जो
पल-पल उसके जिस्म से उसकी सांसे खींच रहे थे
नन्ही सी वो कली अब एक जिंदा लाश में तब्दील हो गई थी
जिसका बस दाह-संस्कार होना बाकी था।

26 comments:

  1. गज़ब संवेदना...

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  2. मार्मिक भाव।

    सादर

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  3. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन त्रासदी का एक साल - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (17-06-2014) को "अपनी मंजिल और आपकी तलाश" (चर्चा मंच-1646) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  5. मार्मिक भाव। बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  6. सुंदर व अर्थपूर्ण पंक्तियां...

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  7. बेजोड़ रचना

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  8. बहुत मर्मस्पर्शी रचना...

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  9. मार्मिक प्रस्तुति।

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  10. सार्थक एवं संवेदना से परिपूर्ण...बेहद मर्मस्पर्शी रचना…

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  11. दिल को छू गई आप की कविता।

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