Monday, May 26, 2014

प्रेम प्रणय की बेला

प्रेम प्रणय की इस बेला को
जी भर कर जीना है अब

तुझसे मिलन की उत्कंठा को
अविरल जल सा बहना है अब

गीत भी होगा रीत भी होगी
मीत भी होगा प्रीत भी होगी

हृदय में दबी अभिलाषाओं को
इक चिड़िया सा उड़ना है अब

मां-पापा के दिवा स्वप्न को
पुल्कित होते सबके मन को
स्वस्रेह से सींचना है अब

तुझसे मुझको मुझसे तुझको
पवित्र बंधन में बंधना है अब

प्रेम प्रणय की इस बेला को
जी भर का जीना है अब।।।

10 comments:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

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    1. चर्चा मंच पर मेरी कृति को स्थान देने के लिए आपका धन्यवाद...
      सादर

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  2. हार्दिक बधाई !
    बहुत ही बढ़िया।

    सादर

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    1. आपका शुक्रिया यशवंत जी

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  3. खूबसूरत अभिव्यक्ति...

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  4. खूबसूरत अभिव्यक्ति...

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