Tuesday, July 29, 2014

डोर जैसी जिंदगी


सच है एक डोर जैसी तो होती है हमारी जिंदगी
एक डोर की सारी खूबियां होती हैं इसमें 

कभी रेशम की डोर जैसी सरल और सहज
लेकिन जरा सी लापरवाही से उलझ जाने वाली

कभी ऊन की डोर जैसी मोटी और सख्त
लेकिन दूसरों की जिंदगी में इंद्रधनुषी रंग भरने वाली

कभी एंकर के धागे जैसी थोड़ी मुलायम और कुछ कठोर
पर बेकार से एक जिस्म पर प्रेम के बेल-बूटे गढ़ने वाली

कभी पतंग के मांझे जैसी तेज-तर्रार और पैनी
लेकिन लक्ष्य से दूर होते ही अस्तित्वविहीन होने वाली

कभी सूत के धागे जैसी सफेद और चमकदार
सबकी जिंदगी में धवल चांदनी बिखेरने वाली

कभी बान की डोर जैसी मजबूत और जिद्दी
अपने बारम्बार प्रयास से सिल पर निशान डाल देने वाली

कभी कपड़े सुखाने वाली डोर जैसी सहनशील
अथाह बोझ सहकर भी आह न करने वाली

सच है एक डोर जैसी ही तो है हमारी जिंदगी
चाहे कितनी ही गुण समा ले अपने अंदर

बन जाए चाहे कितनी ही मजबूत और सहनशील
लेकिन एक तेज झटके से जैसे टूट जाती है डोर

वैसे ही एक झटके में सांसों का साथ छोड़कर
देह को निर्जीव कर देने वाली

59 comments:

  1. कभी ऊन की डोर जैसी मोटी और सख्त
    लेकिन दूसरों की जिंदगी में इंद्रधनुषी रंग भरने वाली

    डोर सी उलझती सुलझती ज़िन्दगी.... सुन्दर पंक्तियाँ

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    1. बहुत आभार मोनिका जी

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  2. कभी बान की डोर जैसी मजबूत और जिद्दी
    अपने बारम्बार प्रयास से सिल पर निशान डाल देने वाली

    वाह बहुत ही बढ़िया रचना

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    1. बहुत आभार स्मिता जी

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  3. कभी पतंग के मांझे जैसी तेज-तर्रार और पैनी
    लेकिन लक्ष्य से दूर होते ही अस्तित्वविहीन होने वाली।
    बहुत गंभीर।
    नई रचना: इंसान

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    1. शुक्रिया राहुल जी

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  4. This comment has been removed by the author.

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  5. जिंदगी

    कभी ठोस तो कभी तरल
    कभी सुधा तो कभी गरल
    कभी सघन तो कभी विरल
    वाष्प सरीखे उड़ता रहता
    कभी नए परिधान पहनता
    कभी रूप परिवर्तन करता
    आना जाना एक सत्य है
    चलता रहता है नित अविरल

    (अज़ीज़ साहब की चंद पंक्तियाँ )

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    1. बहुत बढ़िया मधु जी

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    1. आभार कालीपद जी

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  7. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 31/07/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

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    1. बहुत आभार कुलदीप जी

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  8. सुन्दर अभिव्यक्ति...

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  9. बहुत ही बढ़िया


    सादर

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  10. कभी बान की डोर जैसी मजबूत और जिद्दी
    अपने बारम्बार प्रयास से सिल पर निशान डाल देने वाली

    कभी कपड़े सुखाने वाली डोर जैसी सहनशील
    अथाह बोझ सहकर भी आह न करने वाली
    ....वाह..बहुत सुन्दर और सटीक प्रस्तुति...

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    1. बहुत बहुत आभार

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  11. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 31-07-2014 को चर्चा मंच पर { चर्चा - 1691 }ओ काले मेघा में दिया गया है
    आभार

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद!

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  12. सुंदर प्रस्तुति

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  13. कभी पतंग के मांझे जैसी तेज-तर्रार और पैनी
    लेकिन लक्ष्य से दूर होते ही अस्तित्वविहीन होने वाली
    सुन्दर

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  14. वैसे ही एक झटके में सांसों का साथ छोड़कर
    देह को निर्जीव कर देने वाली

    ....वाह..बहुत सुन्दर और सटीक प्रस्तुति...

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  15. जिंदगी की ये डोर बंधी रहे एक आशा के साथ हमेशा हमेशा ...
    सुन्दर रचना है ...

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद!

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  16. आपकी इस रचना का लिंक दिनांकः 1 . 8 . 2014 दिन शुक्रवार को I.A.S.I.H पोस्ट्स न्यूज़ पर दिया गया है , कृपया पधारें धन्यवाद !

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  17. Replies
    1. प्रतिक्रिया के लिए बहुत आभार

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  18. कभी ऊन की डोर जैसी मोटी और सख्त
    लेकिन दूसरों की जिंदगी में इंद्रधनुषी रंग भरने वाली

    बेहतरीन ...

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  19. सुंदर परिकल्पना

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  20. बहुत ही बढियां संज्ञान दिया आपने ज़िंदगी को
    बहुत सुन्दर रचना रची है। बधाई

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  21. लाजबाब अभिव्यक्ति है आपकी

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    1. आभार अनामिका जी

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  23. डोर से बंधी जिंदगी ...........बेहतरीन !!

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  24. बढ़िया कल्पनाशीलता , मंगलकामनाएं !

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    1. सादर धन्यवाद सतीश जी

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  25. कभी रेशम की डोर जैसी सरल और सहज
    लेकिन जरा सी लापरवाही से उलझ जाने वाली-----

    जीवन के यथार्थ से परिचित कराती और मानवीय संवेदनाओं को
    अभिव्यक्त करती सुन्दर रचना
    अदभुत
    बधाई ---

    आग्रह है ------मेरे ब्लॉग में सम्मलित हों
    आवाजें सुनना पड़ेंगी -----

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    1. सादर धन्यवाद खरे जी

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  26. उम्दा रचना और बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ

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  27. जिंदगी को दर्शाती बेहतरीन रचना

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