Wednesday, July 23, 2014

प्रीत की धुन


तन्हाई हमें खामोश रहकर बहुत कुछ बताती है
खमोशी अक्सर तन्हाई में धुन कोई गुनगुनाती है

हौले-हौले दबे पांव से दिल में जब तू आती है
तेरे चेहरे की रंगत तब सुर्ख लाल हो जाती है

पायल की छन-छन भी तेरी कोई राग सुनाती है
झुकती उठती पलकें तेरी बेकरार कर जाती हैं

हाथों के कंगन जब तू खन-खन-खन खनकाती है
मन में मेरे प्रेम की एक धारा सी बह जाती है

प्यारी तेरी बोली इतनी मेरा मन भरमाती है
तुझमें ही खो जाऊं मैं चुपके से कह जाती है

बंद आंखों से तू हर जगह नजर मुझे आती है
आंखें खोलूं तो न जाने क्यूं ओझल तू हो जाती है

एक दिन होगी तू मेरी हर तन्हाई यही बताती है
खामोशी भी तन्हाई में प्रीत की धुन ही गाती है

31 comments:

  1. ख़ामोशी बोलती भी गुनगुनाती भी है ........सुन्दर अहसाह

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    1. प्रतिक्रिया के लिए आभार मधु जी

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    1. धन्यवाद जोशी जी

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  3. बहुत ही बढ़िया


    सादर

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    1. शुक्रिया यशवंत जी

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  4. बहुत सुंदर प्रस्तुति !

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  5. हौले-हौले दबे पांव से दिल में जब तू आती है
    तेरे चेहरे की रंगत तब सुर्ख लाल हो जाती है

    ......लाज़वाब....दिल को छूते बहुत कोमल अहसास...!!

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    1. बहुत आभार संजय जी

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  6. वाह। क्या बात है।
    बेहतरीन एहसास

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  7. हाथों के कंगन जब तू खन-खन-खन खनकाती है
    मन में मेरे प्रेम की एक धारा सी बह जाती है ..
    प्रेम के कुछ अनछुए पहलुओं को लेकर बुनी ग़ज़ल ... बहुत ही लाजवाब ...

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  8. श्रृंगार रस कुछ ऐसा भी!

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    1. प्रतिक्रिया के लिए आभार माहेश्वरी जी

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  9. प्यारी तेरी बोली इतनी मेरा मन भरमाती है
    तुझमें ही खो जाऊं मैं चुपके से कह जाती है

    खूबसूरत पंक्तियाँ

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  10. प्यारी तेरी बोली इतनी मेरा मन भरमाती है
    तुझमें ही खो जाऊं मैं चुपके से कह जाती है( सुंदर प्रस्तुति !)

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