Wednesday, April 30, 2014

लक्ष्मण रेखा

तुम्हारे पुरुषत्व के अहंकार पर मैं वारी जाऊं
पति हो तुम मेरे तो क्यों न तुम पर सर्वस्व लुटाऊं
मां-बाप ने बचपन से सिखाया
पति की सेवा करना है तुम्हारा परम धर्म
वो कभी समझे या न समझे तुम्हारे दिल का मर्म
लेकिन नहीं, मैं हूं आज की सबला नारी
जो है हर परिस्थिति और किस्मत पर भारी
औरतों के लिए तुम्हारी दोहरी मानसिकता
को नहीं कर सकती मैं अनदेखा
इसलिए खींच रही हूं मैं तुम्हारे और
अपने बीच एक लक्ष्मण रेखा
पर एक दिन
मैं दूंगी तुम्हें अपना तन, मन और पूरा मान
लेकिन तब, जब तुम करोगे तुम
पूरे दिल से ‘हर स्त्री’का सम्मान

3 comments:

  1. जब तुम पूरे दिल से करोगे हर स्त्री सम्मान!
    काश कि ऐसी सबकी सोच सबकी बने
    बहुत बढ़िया !

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