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क्यों ये चांद दिन में नजर आता है

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ख्वाबों खयालों में हर पल तेरा चेहरा नजर आता है ऐ मेरे मालिक बता, क्यों ये चांद दिन में नजर आता है लगा के काजल दिन को रात कर दो  क्या कोई बता के नजर लगता है क्यों ये चांद दिन में नजर आता है क्यों ये दिल इतना बेवस है कौन जाने क्या कशमकश है मेरे मौला कुछ समझ नहीं आता है क्यों ये चांद दिन में नजर आता है ये नकाब हो गया है दुश्मन मेरा रुख से जरा हटाओ दिखाओ दिलकश चेहरा खुदा की नेमत को भी कोई छुपाता है क्यों ये चांद दिन में नजर आता है इतना आसां नहीं तुम्हें भुला देना मदहोश हो जाऊं तो यारों हिला देना उनकी आमद से मौसम बदल जाता है क्यों ये चांद दिन में नजर आता है हमें देखकर वो अक्सर घबरा जाते हैं शायद रुसबा होने से डर जाते हैं बेजान जिस्म पर क्यों तरस नहीं आता है क्यों ये चांद दिन में नजर आता है

तुम चुप रहो

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एक नन्ही सी कली के टूटे-फूटे स्वर जैसे ही सधकर निकलना शुरू होते हैं तभी से उसे चुप रहने का पाठ पढ़ाया जाता है चुप रहना ही है लड़कियों का गहना  उन्हें यह समझाया जाता है जैसे-जैसे वे बड़ी होती जाती हैं उनके बोलने पर बंदिशे बढ़ती जाती हैं तुम चुप रहो, लड़कियां ज्यादा बोलते हुए अच्छी नहीं लगतीं, ये कहकर बंद करा दिया जाता है उनका मुंह और बाहर निकलने को बेताब उनके शब्द अंदर ही घुटकर तोड़ देते हैं अपना दम जब भी  वे कोशिश करती हैं कुछ बोलने की उनके सामने पेश कर दिये जाते हैं  कई ऐसी लड़कियों के उदाहरण जिनके कम बोलने से ही उनके  अच्छा होने की सार्थकता सिद्ध होती है कभी नहीं बोल पातीं वे  पहले बाप के डर से, समाज के डर से फिर कभी पति के डर से, कभी सास के डर से एक दिन सोचा मैंने कि क्या करती हैं आखिर वे अपने अनकहे शब्दों का शायद सहेजती रहती होंगी उन्हें और गुंथकर बना लेती होंगी उनकी एक माला फिर जब इस दुनिया को छोड़ वे  चली जाती होंगी दूसरी दुनिया में तब श्रद्धांजली स्वरूप अपनी लाश पर चढ़ा लेती होंगी अपने ही शब्दों की ...

जिंदगी

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एक  अबूझ पहेली जिंदगी एक खुशनुमा अहसास जिंदगी हर पल कुछ हासिल करने की चाह जिंदगी कभी काली परछाई सी तो कभी सुनहरे प्रतिविम्ब सी जिंदगी हर पल दरकते रिश्तों में  अपनत्व का गारा भरती जिंदगी कभी पतंग के माझे सी उलझती कभी रेशम की डोर सी सुलझती जिंदगी कभी फूलों सी सुगंध बिखेरती कभी कांटों सी भेदती जिंदगी कभी अधूरे ख्वाब सी कभी सम्पूर्ण विश्वास सी जिंदगी हमें अपनों से दूर कर रुलाती और फिर हमारी गोद में किलकारियां दे जाती जिंदगी हर खुशी, हर गम में हमें अनवरत  चलते जाने का पाठ पढ़ाती जिंदगी

तुम्हारा नाम लिखेंगे

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मुकद्दर-ए-दस्त के हर सफे पे तुम्हारा नाम लिखेंगे तुम्हीं से आगाज और तुम्हीं से अपना अंजाम लिखेंगे याद आएगी जब तुम्हारी तुम्हें पैगाम लिखेंगे खत में तुम्हें हम अपना सलाम लिखेंगे और फिर उसमें लफ्ज-ए-मोहब्बत तमाम लिखेंगे दूर तुम्हें हम खुद से कभी होने नहीं देंगे अपनी चाहत को हम कभी खोने नहीं देंगे हमारे दरमियां कभी फासलों को आने नहीं देंगे जर्रे-जर्रे पे अपने इश्क का कलाम लिखेंगे मुकद्दर-ए-दस्त के हर सफे पे तुम्हारा नाम लिखेंगे जहां की सारी खुशियों को तुम्हारे दामन में भर देंगे दिल अपना निकालकर तुम्हारे कदमों में रख देंगे आंसू का एक कतरा भी आंखों से गिरने नहीं देंगे आशिकी की किताब में खुद को तुम्हारा गुलाम लिखेंगे मुकद्दर-ए-दस्त के हर सफे पे तुम्हारा नाम लिखेंगे

बस इतना है कहना

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बहुत कुछ अनकहा है मेरे और तुम्हारे बीच बहुत कुछ है जो कहना चाहती हूं मैं तुमसे बताना चाहती हूं तुम्हें कि तुम्हारे होने से ही  मुझे अपनी धड़कनोें का एहसास होता है तुम्हारी एक धीमी सी मुस्कारहट भी  मुझमें नई ऊर्जा का संचार कर जाती है तुम्हारा मुझसे ये कहना कि  नहीं रह सकते तुम मेरे बिना मेरे वजूद को और मजबूत बना देता है जब कोई करता है तुम्हारी तारीफ तो मुझे खुद पर गर्व का अनुभव होता है जब तुम मेरा हाथ पकड़ते हो तो लगता है  कि जीवन का हर युद्ध हैं जीत जाऊंगी तुम्हारा साथ मुझे जेठ की दुपहरी में भी ठंडक सा दे जाता है तुमसे दूर होने का खयाल भी मुझे भीड़ में तन्हा कर जाता है तुम्हारी आंखों में चाहत की वो शिद्दत देखकर तुम पर फना हो जाने को जी चाहता है तुम्हारे बिना गुजारे कुछ पल भी मुझे  सदियों से लम्बे लगते हैं और तुम्हारे साथ बिताए कई घंटे  मिनटों में बदल जाते हैं अब मुझे तुमसे बस इतना है कहना कि मुमकिन नहीं है मेरा तुम्हारे बिना रहना

दाह-संस्कार

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उम्र में तरुणाई सी छाने लगी थी बचपन से निकल कर मन यौवन की कुलाचें भरने लगा था कई रंगीन सपने उसकी आंखों में पलने लगे थे प्रेम के मोती हृदय की सीपी से बाहर निकलने लगे थे सफेद घोड़े पर बैठा राजकुमार उसे हर पल नजर आता था और आज तो वो राजकुमार उसके सामने था उसे लगा कि उसकी उम्मीदों को आज परवाज मिल गई खो जाना चाहती थी वो उसकी बाहों में पंख लगाकर उड़ जाना चाहती दूर आसमान में फिर एक दिन ले गया वो उसको अपने साथ ये कहकर, कि दूर कहीं हम अपने प्यार का एक जहां बसाएंगे एक-दूसरे से किए हर वादे को ता-उम्र निभाएंगे लेकिन ये क्या, वो तो छोड़ आया उस मासूम लड़की को वहां जहां हर दिन न जाने कितनी लड़कियां बेमौत मरती थीं अभी-अभी तो लड़की के परों में जान आई थी और अभी उसको पिंजड़े में कैद कर दिया सहमी हुई सी लड़की बेचैन निगाहों से  ताक रही थी चिर शून्य आसमान जहां उसे अपना भविष्य काले बादलों में  खोता हुआ नजर आ रहा था हर दिन उसे परोस दिया जाता था  कई अनचाहे मेहमानों के सामने जो पल-पल उसके जिस्म से उसकी सांसे खींच रहे थे नन्ही सी वो कली अब एक जिंदा ला...

मेरे पापा

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दूसरी बेटी होने पर जब सब ने मां को कोसा। पापा ने आगे बढ़कर उस दिन सबको रोका।। पहली बार उन्होंने जब मुझे गोद में उठाया। कहते हैं वो उस दिन को, मैं कभी भुला न पाया।। लड़ती थी मैं उनसे, झगड़ती थी मैं उनसे। बरगद से लता की तरह, लिपटती थी मैं उनसे।। घुटनों के बल चलकर, गोद में मैं चढ़ जाती थी। फलों की आढ़त वाला दूल्हा लाना, कहकर मैं इतराती थी।। मेरे पीछे-पीछे दौड़कर मुझे साइकिल चलाना सिखाया। अपने हर फर्ज को उन्होंने बखूबी निभाया।। मेरे गिरने से पहले ही उन्होंने मुझे संभाला। मेरी हर ख्वाहिश को अपने सपनों सा पाला।। जो कुछ भी मैंने पाया, उनसे ही है पाया। सिर पर पापा का हाथ जैसे तरुवर की है छाया।। दूर रहकर भी मुझसे, दिल से हैं वो मेरे पास। पापा की प्यारी बेटी होने सा नहीं है कोई एहसास।।