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एक प्रेम का दीप जला जाना

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जब शाम ढले और रात चले तुम मन मन्दिर में आ जाना आकर के तुम उसमें बस एक प्रेम का दीप जला जाना जब अम्बर में बिखरे चांदनी और तारों की बारात सजे सिर मेरा गोद में रखकर तुम अपनी मुझे प्रीत की लोरी सुना जाना जब सुध-बुध अपनी मैं खोऊं और गहरी नींद में मैं सोऊं सुंदर रूप सलोना मुखड़ा तुम ख्वाब में आकर दिखला जाना सुबह जब सूरज सिर पे चढ़े और चिड़ियों की चहचहाहट मन में घुले तुम भीगी जुल्फों के छींटे बरसाकर मुझे नींद से जगा जाना एक प्रेम का दीप जला जाना।।

प्रेम प्रणय की बेला

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प्रेम प्रणय की इस बेला को जी भर कर जीना है अब तुझसे मिलन की उत्कंठा को अविरल जल सा बहना है अब गीत भी होगा रीत भी होगी मीत भी होगा प्रीत भी होगी हृदय में दबी अभिलाषाओं को इक चिड़िया सा उड़ना है अब मां-पापा के दिवा स्वप्न को पुल्कित होते सबके मन को स्वस्रेह से सींचना है अब तुझसे मुझको मुझसे तुझको पवित्र बंधन में बंधना है अब प्रेम प्रणय की इस बेला को जी भर का जीना है अब।।।

मजूदर औरत

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न हूं मैं गार्गी और न ही पद्मावती न मैं कल्पना चावला और न ही इंदिर नुई न हूं मैं झांसी की रानी और न ही विजयलक्ष्मी न मैं मैरी कॉम और न ही अरुंधती मैं हूं एक साधारण सी मजदूर औरत मेरे पास नहीं है रंगीन सपनों का आकाश और न ही नित नई उम्मीदों की जमीन मेरे पास नहीं हैं रुपये अपनी ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए हां मेरे पास आकाश है तेज धूप से भरा हुआ और जमीन भी है जिससे मिट्टी खोदकर मुझे छठी मंजिल तक ले जानी है मेरे पास रुपये भी हैं लेकिन अपने भूखे बच्चों का पेट भरने के लिए मुझे नहीं मिली इतनी शिक्षा की मैं सफलता की उड़ान भरूं लेकिन मेरे पास है मेरी मेहनत जिससे अपने बच्चों में अपने सपनों को जी सकूं।

बचपन की यादें

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गर्मी की भरी दुपहरी में जब गांव की गलिया सो जाती थीं आंधी जैसी लू से डरकर चिड़ियां पत्तों में छुप जाती थीं हमें सुलाने की कोशिश में जब नानी खुद सो जाती थीं हम धीरे से उठकर तब बाहर आते थे आम के बाग की ओर तेज दौड़ लगाते थे कभी डंडा तो कभी पत्थर कच्चे आमों पर बरसाते थे हमारी अनगिनत कोशिशों के बाद जब कुछ आम टूटकर गिर जाते थे उन्हें देखकर हम खुशी से फूले नहीं समाते थे नमक-मिर्च लगाकर हम कच्चे आमों को खाते थे हमें देखकर दूसरों के भी दांत खट्टे हो जाते थे फिर खाते थे मम्मी की डांट और दादी के ताने सुनते थे आंखो में मोटे आंसू देखकर पापा हमें मनाते थे अक्सर याद आती हैं बचपन की वे बातें जब लाख डांट पड़ने पर भी हम गलतियां दोहराते थे।

लक्ष्मण रेखा

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तुम्हारे पुरुषत्व के अहंकार पर मैं वारी जाऊं पति हो तुम मेरे तो क्यों न तुम पर सर्वस्व लुटाऊं मां-बाप ने बचपन से सिखाया पति की सेवा करना है तुम्हारा परम धर्म वो कभी समझे या न समझे तुम्हारे दिल का मर्म लेकिन नहीं, मैं हूं आज की सबला नारी जो है हर परिस्थिति और किस्मत पर भारी औरतों के लिए तुम्हारी दोहरी मानसिकता को नहीं कर सकती मैं अनदेखा इसलिए खींच रही हूं मैं तुम्हारे और अपने बीच एक लक्ष्मण रेखा पर एक दिन मैं दूंगी तुम्हें अपना तन, मन और पूरा मान लेकिन तब, जब तुम करोगे तुम पूरे दिल से ‘हर स्त्री’का सम्मान

कुछ कहमुकरियां

देर रात वो मुझको सताए आहट करके मुझको जगाए उसने छीना मेरा चैन ऐ सखि साजन!न सखि वॅाचमैन।। ---------------------- उसको देख के मैं छुप जाऊँ जहां हो वो वहाँ मैं नहीं जाऊँ उसने बानाया मुझे बावली ऐ सखि साजन!न सखि छिपकली।। ----------------------- वो है सबसे भोला-भाला मन का सच्चा और निराला उसके लिए मन में नहीं कोई सवाल ऐ सखि साजन!न सखि केजरीवाल।। ------------------------ जब-जब मैं फोन उठाऊं उसको देख के मैं मुस्काऊं नहीं है उसमें कोई ऐब ऐ सखि साजन!न सखि व्हॅाट्स ऐप।।

तुम 'लड़की' हो

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कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम क्या करती हो, तुम्हारी उम्र क्या है, तुम्हारा पहनावा कैसा है, तुम्हारा रहन-सहन कैसा है, तुम साहसी हो या कमजोर तुम 'लड़की' हो, बस इतना ही काफी है तुम्हारा यौन शोषण होने के लिए।।। कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम अकेली हो तुम्हारा साथ कोई देता या नहीं तुम्हारी खिल्ली उड़ाई जाती है तुम्हारी आलोचना होती है तुम्हें दोयम दर्जे की समझा जाता है फिर भी, तुम 'लड़की' हो और तुम्हारी एक साहस भरी आवाज ही काफी है समाज की विकृत होती मानसिकता को एक सही दिशा दिखाने के लिए।