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लक्ष्मण रेखा

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तुम्हारे पुरुषत्व के अहंकार पर मैं वारी जाऊं पति हो तुम मेरे तो क्यों न तुम पर सर्वस्व लुटाऊं मां-बाप ने बचपन से सिखाया पति की सेवा करना है तुम्हारा परम धर्म वो कभी समझे या न समझे तुम्हारे दिल का मर्म लेकिन नहीं, मैं हूं आज की सबला नारी जो है हर परिस्थिति और किस्मत पर भारी औरतों के लिए तुम्हारी दोहरी मानसिकता को नहीं कर सकती मैं अनदेखा इसलिए खींच रही हूं मैं तुम्हारे और अपने बीच एक लक्ष्मण रेखा पर एक दिन मैं दूंगी तुम्हें अपना तन, मन और पूरा मान लेकिन तब, जब तुम करोगे तुम पूरे दिल से ‘हर स्त्री’का सम्मान

कुछ कहमुकरियां

देर रात वो मुझको सताए आहट करके मुझको जगाए उसने छीना मेरा चैन ऐ सखि साजन!न सखि वॅाचमैन।। ---------------------- उसको देख के मैं छुप जाऊँ जहां हो वो वहाँ मैं नहीं जाऊँ उसने बानाया मुझे बावली ऐ सखि साजन!न सखि छिपकली।। ----------------------- वो है सबसे भोला-भाला मन का सच्चा और निराला उसके लिए मन में नहीं कोई सवाल ऐ सखि साजन!न सखि केजरीवाल।। ------------------------ जब-जब मैं फोन उठाऊं उसको देख के मैं मुस्काऊं नहीं है उसमें कोई ऐब ऐ सखि साजन!न सखि व्हॅाट्स ऐप।।

तुम 'लड़की' हो

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कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम क्या करती हो, तुम्हारी उम्र क्या है, तुम्हारा पहनावा कैसा है, तुम्हारा रहन-सहन कैसा है, तुम साहसी हो या कमजोर तुम 'लड़की' हो, बस इतना ही काफी है तुम्हारा यौन शोषण होने के लिए।।। कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम अकेली हो तुम्हारा साथ कोई देता या नहीं तुम्हारी खिल्ली उड़ाई जाती है तुम्हारी आलोचना होती है तुम्हें दोयम दर्जे की समझा जाता है फिर भी, तुम 'लड़की' हो और तुम्हारी एक साहस भरी आवाज ही काफी है समाज की विकृत होती मानसिकता को एक सही दिशा दिखाने के लिए।

गुलाल जो बिखरा था राहों में

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रंग और गुलाल जो बिखरा था राहों में आती-जाती भीड़ और उड़ता धूल का गुबार राहों में याद करती उस दिन को जब उससे मिली थी इन्हीं राहों में साथ चलते-चलते छूट गया था हाथ कहीं राहों में देख रही थी वो ख्वाब जो बिखरा था राहों में कर रही थी वो बैठी इंतजार राहों में साथ चलेंगे फिर वे बनकर हमसफर जिंदगी की राहों में

मेरा भरोसा

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आरजू-ए-इश्क तो हम भी रखते हैं इस अरज़1  के लोगों से मोहब्बत हम भी करते हैं एक अफवाह से आशुफ्ता2 हो गए हैं हम कि लोग कहते हैं कि एक अश्किया3  से इश्क कर बैठे हैं हम लेकिन उनके अस्काम4 अल्फाजों का नहीं पड़ता है मुझपे कोई असर सोच जो लिया है मैंने कि जिंदगी तो करनी है मुझे उसके ही साथ बसर यूं तो इस दुनिया में न तो कोई अच्छा है और न ही है कोई बुरा अक़िबत5 में क्या होगा ये है किसको पता आगाज करने में ही जो हम घबरा जाएंगे तो खुशियों को अपने आगोश में कभी न समेट पाएंगे इस जहां में कोई भी तो नहीं है अर्जमंद6 शक का जो दार7 बनाएंगे तो खुशियां कहां से लाएंगे कोई कुछ भी रहता रहे मुझे है उस पर पूरा भरोसा मेरी आंखों में आब-ए-चश्म8 का अस्बाब9 न बनेगा वो कभी नाआश्नाओं10 की बातों में आकर खुद पर न सितम ढाएंगे 1-धरती 2- भ्रमित 3-कठोर दिल 4-बुरे  5-भविष्य 6-महान 7-घर  8-आंसू 9- कारण 10-अजनबियों

अंतर

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रात के बारह बज रहे थे। अंकिता अपने पति का आॅफिस से लौटने का इंतजार कर रही थी। तभी डोर वेल बजी। अंकिता ने उठकर दरवाजा खोला। सामने अनिकेत चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट के साथ खड़ा था। अंकिता ने उसको गले लगाया और उससे फ्रेश होने को कहकर खाना निकालने चली गई। दोनों साथ में खाना खा रहे थे, तभी अंकिता ने अनिकेत से कहा कि आज आॅफिस में साथ काम करने वाले एक कलिंग ने उससे बोला कि अगर आपके घर के पास कोई कमरा खाली हो तो मुझे दिलवा दीजिए लेकिन मैंने एक-दो रूम के बारे में बताया और बहाना बनाकर टाल दिया। दरअसल अंकिता और अनिकेत दोनों एक ही आॅफिस में काम करते हैं ल ेकिन अंकिता की दिन की शिफ्ट होती है और अनिकेत की इवनिंग शिफ्ट होती है। इस  बात पर अनिकेत बिफर गया और बोला कि उसने तुमसे ही क्यों कमरा दिलवाने के लिए बोला , मैं भी तो वहीं काम करता हूं फिर उसने मुझसे क्यों नहीं बोला। अंकिता ने अपनी  सफाई देनी चाही लेकिल अनिकेत कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था। अंकिता ने अनिकेत से बात करनी चाहिए लेकिन अनिकेत नींद आने का बहाना बनाकर सोने चला गया। अंकिता बिस्तर पर लेटी और उसे कुछ दिन पुरानी घटना याद गई। जब ...

हनुमान और राम

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एक ही कक्षा में पढ़ते थे हनुमान और राम मेधावी थे राम और हनुमान बेकाम गुंडा गर्दी में वे आगे खेलकूद में सरपट भागे राम थे पोथी तक सीमित और पढ़ाई में आगे इम्तिहान जब सिर पर आया, हनुमान ने पाठ पढ़ाया मां से कहा मेहनत है पड़ती इसलिए दुगना घी खाया हुए परीक्षा फल जब घोषित हनुमान थे अनुत्तीर्ण और राम हुए उत्तीर्ण हनुमान ने लगा लिया अब चौराहे पर खोखा जिसमें रखकर बेचते थे वे आगरे वाला पेठा राम ने आगे की पढ़ाई और डिग्रियां पार्इं पर ये सारी विद्या उनको रोटी न दे पाई आखिर थक कर गए वो हनुमान के पास बोले यार काम न मिलता मैं हूं एमए पास हनुमान से सोचा समझा फिर लिखी एक पाती कपड़े की मिल में यार को अपने बना दिया चपरासी